रीवा में रोज़गार का नया मॉडल: खाली ज़मीन से 200 परिवारों का संवरेगा भविष्य | Hridesh News Network
रीवा के विकास और रोजगार का नया ब्लूप्रिंट: खाली पड़ी जमीन से 200 परिवारों का संवर सकता है भविष्य
व्यवस्था परिवर्तन की पुकार: जन-प्रतिनिधि करें काम, नहीं तो जनता खुद चुनेगी अपना 'क्राउडफंडेड' विकल्प
रीवा। किसी भी शहर के विकास का पैमाना सिर्फ बड़ी इमारतें नहीं होतीं, बल्कि यह होता है कि वहां के आम नागरिक और युवाओं के पास रोजगार के कितने साधन हैं। जमीनी हकीकत पर नजर डालें, तो हमारे आस-पास ही कई ऐसे संसाधन और जगहें मौजूद हैं, जिनका अगर सही नियोजन किया जाए, तो सैकड़ों परिवारों के घरों का चूल्हा शान से जल सकता है। बस जरूरत है तो प्रशासनिक इच्छाशक्ति और एक ठोस विजन की।
समस्या नहीं, समाधान पर बात
रीवा शहर में इंजीनियरिंग कॉलेज, कोर्ट और बीएड कॉलेज के सामने शिव नगर मोड़ से लेकर मार्तंड नंबर 2 तक सड़क के किनारे लगभग 10-12 फीट चौड़ी जमीन खाली पड़ी है। वर्तमान में यह जगह अनुपयोगी झाड़ियों से घिरी हुई है। यदि इन झाड़ियों को साफ कर दिया जाए (यह सुनिश्चित करते हुए कि उपयोगी और हरे पेड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे) और खुली नालियों को व्यवस्थित ढंग से ढक दिया जाए, तो यह जगह रोजगार के एक बड़े केंद्र में तब्दील हो सकती है।
पीएम मुद्रा योजना से जुड़ा 'पोर्टेबल गुमटी' मॉडल
इस खाली जगह का उपयोग शहर की सुंदरता बढ़ाने और रोजगार पैदा करने, दोनों के लिए किया जा सकता है। प्रशासन की ओर से यहाँ एक समान दिखने वाली, सांची पार्लर जैसी सरकारी 'पोर्टेबल गुमटियां' (Movable Kiosks) स्थापित की जा सकती हैं।
इन गुमटियों को स्थानीय बेरोजगार युवाओं और जरूरतमंदों को आवंटित किया जा सकता है, जहां वे ताजे फल, सब्जियां, दूध और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं का साफ-सुथरा व्यवसाय कर सकें। इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए किसी बड़े निवेश की भी आवश्यकता नहीं है। केंद्र सरकार की 'पीएम मुद्रा योजना' के तहत 50,000 रुपये तक के शुरुआती लोन का लाभ उठाकर 100 से 200 परिवारों को सीधा स्वरोजगार दिया जा सकता है। यह मॉडल न केवल अतिक्रमण की बेतरतीब समस्या को खत्म करेगा, बल्कि शहर को एक व्यवस्थित 'वेंडिंग जोन' भी देगा।
नेताओं से अपील और जनता का 'अल्टीमेटम'
इस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए शहर के महापौर और स्थानीय सांसद व विधायकों को दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक साथ आना होगा। जनता ने उन्हें शहर की तकदीर बदलने के लिए चुना है।
लेकिन, अगर वर्तमान जन-प्रतिनिधि इस तरह के सीधे और स्पष्ट जनहित के काम करने में विफल रहते हैं, तो अब वक्त आ गया है कि जनता केवल शिकायत करने तक सीमित न रहे। लोकतंत्र में असली ताकत आम आदमी के पास है। यदि सिस्टम काम नहीं करता है, तो जनता को आगामी चुनावों में 'क्राउडफंडिंग' (चंदा) के माध्यम से अपना खुद का एक स्वतंत्र प्रतिनिधि खड़ा करना चाहिए। एक ऐसा प्रतिनिधि जो सीधे जनता के पैसे से चुनाव लड़े और जीतने के बाद सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह हो, न कि किसी पार्टी के आलाकमान के प्रति।
निष्कर्ष
हृदेश न्यूज़ नेटवर्क (HNN) का हमेशा से यह मानना रहा है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ समस्याएं गिनाना नहीं, बल्कि जड़ से उस समस्या को खत्म करने के व्यावहारिक समाधान पेश करना है। रोजगार का यह मॉडल रीवा के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि सत्ता में बैठे लोग इस पर अमल करते हैं, या फिर जनता को अपने अधिकारों के लिए खुद एक नया राजनीतिक विकल्प तैयार करना पड़ता है।
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